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Mirza Ghalib

प्रभु , संग्राम और कलुआ (Prabhu, Sangram And Kalua)

 

 



प्रभु जी,
संसार को मिथ्या कहते हैं ,
हरिगुण गान करते हैं,
माया को झुठलाते हैं,
शौक़ीन निगाह रखते हैं,
फिर----
दक्षिणा वसूल करते हैं।



संग्राम जी,
जीवन को युद्ध कहते हैं,
जीव को नश्वर कहते हैं, (अपना नहीं )
स्वार्थ की बलिवेदी पर ,
अपनों को भी चढ़ाते हैं -----
और,,,,,
कर्मप्रधानता का गुण गाते हैं।।



कलुआ ,
उसके लिए जीवन एक नाटक है ,
मज़बूर हो जिया करता है ,
श्रेष्ठ जनों का नाटक देखने के लिए ;
और उसका परिवार ,
गुस्सा खाया, और आंसू पीया करते हैं।।। 

 

 

(A LARGE NUMBER OF INDIVIDUALS IN OUR SOCIETY THE MASTERS OF HIPOCRISY. THEIR PREACHES ARE ENTIRELY DIFFERENT FROM THEIR PRACTSE. AND REALLY THEY ARE VERY HARMFUL FOR THE SIMPLE LIVING SOULS.)

 

 

By Rabindra Nath banerjee(Ranjan)

 

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