Sahitya Sangeet

Literature Is The Almighty & Music Is Meditation

Hindi Ghazal 14

फिक्र होता है जब अमानत का तेरी तस्वीर याद आती है ,
तूने पुरकारी से है छीना जिसे मेरी तक़दीर याद आती है ।
जुर्म नज़रों का था जिया का नहीं जिसमे तुझे वो बसाया था ,
फिर भी उसका ही ज़ियाँ होना था बारहा तदबीर याद आती है ।
होता लज़्ज़त मुझे भी मरने में जो तेरे हाथ मिला होता ,
दशना तेरे हाथ में देकर भी मेरी आखिर याद आती है ।
मज़ाल है जो अश्क़ों से निजात मिले कोशिश में कशिश बताने का ,
ता कूज़ा तल्खी मैं उठाता फिरूं तेरी तहरीर याद आती है ।
लैब पे जुम्बिश ही अभी बाकी है हलक ने साथ मेरा छोड़ दिया ,
बाम-ऐ- पर्वत पे चढ़ा "रंजन" मज़्मुआ-ऐ-साहिर याद आती है ।



Memory of the deposit prompts to think of your portrait,
You have snatched with skill, fate is playing with memory.
It was not the fault of vision but heart, where you dwell,
That is why he is a looser, often destiny plays with memory.
If erased by your hand, it would have been a pleasurable feeling,
Dagger provided to you, even then request was playing with memory.
Even tears had no courage to console, in efforts to show attraction,
How long to carry anguish, your assembly played with memory.
Still, movement of lips are there, voice has betrayed the throat,
Standing on the highest peak, subject matter of the thought playing with memory.

By Rabindranath Banerjee(Ranjan)