sahitya Sangeet

(Literature Is The Almighty & Music Is Meditation)

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Couplets-3




(21)
हम कहते हैं कुछ वो समझते हैं और,
हार कर नज़र को ही ज़बाँ बना लिया !


(22)
डरता हूँ कहीं भुला न बैठूं तुझे,
अरसे से दीद तर ही नहीं हुए !


(23)
मेरा तुम्हारा फैसला होगा ख़ुदा के सामने,
डर है कहीं खुदा भी तरफदार न हो जाये !


(24)
उनके पाँव में मेहँदी लगी है,आने के काबिल नहीं है,
जो कासिद ही रकीब बना हो तो कोई क्या करे !


(25)
लोग वही राह दिखाते हैं "रंजन' को हरदम,
जिस राह पे अक्सर रहजन फिरा करते हैं !


(26)
क़यामत आती तो देख लेते,मुसीबत आती तो झेल लेते,
नज़रें मिलाकर तूने यूँ दावत क्यूँ दी 'रंजन' !


(27)
अब बस भी करो इम्तहान-ए-सब्र की,
मोहब्बत रोकती है शिकायत से ज़बाँ को !


(28)
गोर-ए-गरीबाँ को न छीनो मुझसे,
जान की कीमत दी है इसकी मैंने !


(29)
वो कल कभी न आया कातिल के वादे का,
मौत भी परीशान है रोज़ एक कल देने पर !


(30)
कोई शिकवा भी नहीं कोई शिकायत भी नहीं,
टूटा नशेमन ही था रहा अब वो मुसीबत भी नहीं !
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