sahitya Sangeet

(Literature Is The Almighty & Music Is Meditation)

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Couplets-10




(91)
अदब तो इतना था कि देखने को उनके जानिब ,
दोस्तों से इल्तिजा किया फिरता था वो 'रंजन' I
(92)
मुस्कुराना,झेंप जाना,और वो तेंवर 'रंजन',
पूछ मत इसतरहा बार-बार ये क्या वो क्या !
(93)
रकीब के साथ वो भी आये 'रंजन' से हमदर्दी को ,
खुदा ने भी कैसे कैसों को खूब अदाकारी बख्सा है I
(94)
तू किस अदा से उठ गया मेरे दोस्त और 'रंजन' रोकता ही रहा ,
बहुत देर तक वो सोचता रहा फिर तेरे पीछे हो लिया I
(95)
कभी मुहब्बत-ओ-वफ़ा इस तरफ,कभी अदावत-ओ-ज़फ़ा उस तरफ,
'रंजन' को मकीं का पता तो बता दो,कैसे कैसे किरायेदार है I
(96)
फिर खिजाँ की सवारी गुलशन में आने को है ,
फिर यहाँ 'रंजन' का अनक़रीब नाल: उठने को है !
(97)
दिल के हर कतरे से जो साज़ उठ रहा है ,
अनलबहर क्यूँ खामोश हुआ जा रहा है 'रंजन' !
(98)
'रंजन' जाकर उनसे कह दो अनलहक न कहें ,
इंसान तो बन न सके और खुदा बने फिरते हैं !
(99)
अनवार-ए-इलाही अब भेजने से क्या काम ,
मैकदे में ही दफ़न कर दिया उसने 'रंजन' को !
(100)
बुलबुल बाग़ में ज़रा सम्हल कर बैठना सीखो ,
बद्खूं ने आस्तीं में बदनीयत छुपा रखा है !

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