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Mirza Ghalib

Hindi Couplets Page no.22 

 

 

211.

ज़िन्दगी के लम्हों का हिसाब न करो दूर रह कर ,
"रंजन" का हिसाब करो फिर भूल जाओगे हर हिसाब।। 

212.
मेरी हर राह मंज़िल की हर मोड़ से मुड़ जाती है ,
हमराह जो भी थे साथ सभी हो लिए साथ "रंजन" के।। 

213.
तुम कहते हो ज़िन्दगी बेफिक्री से जिया जाता है ,
फिक्र ही जब साथ न हो तो "रंजन" जियेगा कैसे।। 

214.
उनकी शोखी की अब तो हद हो गई है "रंजन" ,
वस्ल की बात भी कहलाते हैं क़ासिद के जरिये।। 

215.
अब न अब की ताब रही न प्यार की ख्वाहिश "रंजन" ,
दफ़न हो चुकी है हर शै-ओ-बात कूचा-ए-ज़फ़ा में।।

216.
ख़ुशी का इज़हार करूँ किस तरहा "रंजन" ,
मुझ गरीब को अब साहब ने क़ासिद बना लिया।। 

217.
ता ज़िन्दगी ना देखी मेरी तरफ कभी ज़नाब ने ,
"रंजन" से आकर वाकया पुछा वो भी मज़ार पे।। 

218.
हर कल पे मेरी साँस है अटकी हुई "रंजन" ,
उसने जो वस्ल को कल के लिए कहा था।। 

219.
मुयस्सर नहीं मुक़द्दर में मुहब्बत के चंद लम्हें ,
उनकी वफ़ा पे शिकायत हो तो क्यूँकर "रंजन"।। 

220.
आखिरी वक़्त पे जो सलामों का सिलसिला देखा ,
"रंजन" को याद आया कितनों से दुरी बना रक्खा था।।  

 

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