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Mirza Ghalib

Hindi Couplets Page no.21

 


201.
नाक़ाबिल-ए-बयां इस ज़िन्दगी का सिला है ,
"रंजन" हर साँस को गिनो, जियो यही सिलसिला है।

202.
यूँ तो हर पल गम-ए-ज़िन्दगी सताती है हमें ,
"रंजन" कुछ और करो, इस की तो आदत है हमें।

203.
तुमने ख्वाब क्यों दिखाया मुझे इस तरहा ,"रंजन",
शब्-ए-गम अब आँखों में गुज़र रही आजकल।

204.
इम्तिहान लेना तड़पा कर सब्र का "रंजन" का ,
अफ़सोस क्यूँ , अब तो आपका शौक़ पूरा हुआ।

205.
तेरे रूबरू दिल-ए-खाना की रफ़्तार बढ़ जाने का सबब ,
"रंजन" का ख्वाहिश है उम्र तय कर ले तेरे वस्ल में।

206.
अपनों से रक़ीब भले , ज़हर दिया करते हैं "रंजन" ,
अपनों से तो बस ज़हर का एहसास हुआ करता है।

207.
आपका ये बेगानापन , बड़ा एहसान है "रंजन" पर,
हर गैर से रिश्ता जुड़ गया है अब उसका।

208.
बयां कर मज़बूरी वो अपनी राह चल दिए ,
"रंजन" की मज़बूरी , अब कोई राह नहीं।

209.
उनका यूँ रूठना क़यामत ही था कभी "रंजन",
अब उनका रूठना मोहब्बत का इज़हार है। 

210.

क्या कुछ सोचकर मेरे गम में वो शरीक तो हुए "रंजन" ,
और अब कहते हैं ज़नाब , वो वक़्त कुछ और ही था। 

 

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