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Mirza Ghalib

Hindi Couplets Page no.20




191.
या रब शोर कुछ और बुलंद हो दुनिया में,
"रंजन" की दर्द भरी चीखों से निजात तो मिले।

192.
जी भर जलालो आखिरी दम तलक "रंजन" को ,
इल्तिज़ा है मज़ार पे कभी चराग़ न रौशन करना।

193.
रफ़्ता-रफ़्ता ख़्वाहिश जीने की होने लगी "रंजन",
बेरुखी उनकी अब जब जान पर आ बनी है।

194.
हरचंद कोशिश नाकाम हुई अपनों को अपनाने का ,
"रंजन" फिर ख्वाहिश ही क्यूँ गैर के आशियाने का।

195.
गुलशन बहुत शर्मिंदा हूँ मैं तुझसे आखिर ,
"रंजन" क्यूँ पनाह दी बहारों से छुपकर।

196.
एक दो क़ातिल हो तो तुझे बता भी दूँ "रंजन",
गुज़र चूका हर इक पल नश्तर ले तैयार है।

197.
सज़दे में गिरा हूँ , और तुम तैग ले कर तैयार हो ,
"रंजन" इस अदा को क्या कहे धार तो सीधा करो।

198.
दोस्तों ने दुश्मनी की , जो नसीबदार कहा "रंजन" को ,
गरीब को नाचीज़ समझ वो कितना मगरूर हो गए।

199.
कुछ इस क़दर गर्दिश में फंसा था "रंजन",
घबरा कर भंवर के हवाले कश्ती कर दी।

200.
तूफ़ान से दोस्ती आखिर कर ही ली "रंजन",
क्या खबर उसकी नज़र मेरे आशियाने पे थी।

 

 

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