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Mirza Ghalib

Hindi Couplets Page-19

 

 

181.

फिर रहे हैं चाकदामां ता ज़िन्दगी दरबदर ,
"रंजन" वो अंजूमन आरा हैं किसकी फ़िकर हैं।

182.
किस अदा से देख रहे हैं आईने में अदा अपनी,
किस अदा से देखते हैं कहीं देखता तो नहीं "रंजन"।

183.
क्या खूब तोडा दिल ज़माने ने सादा दिल "रंजन" का,
लेकिन नाजनीन तुमसे तो एक टुक ज़फ़ा भी न बनी।

184.

क़ातिल ने ता ज़िंदगी यूँ दौड़ाया उसे ये खुदा,
"रंजन" हरदम भागता रहा खुद के साये से भी।

185.
आज बाजार में किसीने हाल क्या पूछ लिया ,
"रंजन" तभी से उसे दुआ दिए जा रहा हैं।

186.
"रंजन" कब्रिस्तान का इंसाफ कितना नेक हैं,
अमीर हो या गरीब सबके लिए बिस्तर एक हैं।

187.
मुहब्बत ख़ूबसूरत ख्वाबों का एक दफ़नगाह हैं ,
ये तो वो अक़लीम हैं जहाँ अँधेरा ही अँधेरा हैं "रंजन"

188.
कैसे करूँ तज़्किरा तबाही का और किससे,
"रंजन" के सभी हबीब थे जो लूटने वाले थे।

189.
जब से देखा हैं खुद के खून में सफेदी उसने ,
"रंजन" का उठ गया हैं अक़ीदा खून के रिश्ते से।

190.
क़ातिल तुम, मुंसिफ तुम, हाक़िम भी तुम ,
"रंजन" के क़त्ल का दावा करें तो किस पर।

 

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